भोपाल गैस त्रासदी — वो ज़ख्म जो आज तक नहीं भरा

BY DRISHTI PRABHA MAGAZINE | EDITED BY: MOHIT KOCHETA

3 दिसंबर 1984…
भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक और भयावह रात।
वो रात जब भोपाल सो रहा था, लेकिन मौत खामोशी से उसके ऊपर उतर रही थी।

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से रिसी मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस ने कुछ ही घंटों में हजारों लोगों की साँसें छीन लीं।
जो लोग अपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे, वे अचानक आँखें खोलते ही मौत के धुएँ में घिर चुके थे।
कई लोग सड़कों पर दौड़ते-दौड़ते गिर पड़े, हजारों बच्चों ने बिना आवाज़ किए दम तोड़ दिया।

और जो बच पाए…
वह हमेशा के लिए एक दर्द, एक लाचारी और एक ऐसी विकलांगता के साथ जीने को मजबूर हो गए, जिसे समय भी नहीं मिटा पाया।

भोपाल गैस त्रासदी सिर्फ एक हादसा नहीं था—
यह एक ऐसा घाव है, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है।
एक ऐसा सबक, जिसने दुनिया को बताया कि औद्योगिक लापरवाही की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है।

आज, 3 दिसंबर को हम उन मासूमों को याद करते हैं जिन्होंने उस काली रात में सबकुछ खो दिया।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन से बड़ा कोई उद्योग, कोई लाभ और कोई लालच नहीं।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *